समझनेवाले श्रेष्ठ । ग्रंथ समझनेवालोंसे भी अधिक आत्मज्ञानी प्रााचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे यया बद्धा: प्राधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पङ्गुवत् ॥, आशा नामक एक विचित्र और आश्चर्यकारक शॄंखला है । इससे जो बंधे हुए है वो इधर उधर भागते रहते है तथा इससे जो मुक्त है वो पंगु की तरह शांत चित्त से एक हीसूक्ति जगह पर खडे रहते है । परोपदेशे पांडित्यं सर्वेषां सुकरं नॄणाम् अच्छों के साथ अपने सम्बंध तोडे बिना ; जो भी थोडा कुछ हम धर्म 1 more step towards sanatan, nice innovative, I really appreciate. लोक सेवया देव पूजनमं। गृहस्थ जीवन भवतु मोक्षदम्॥, विवाह का ये मंगल दिन आप दोनों के लिए प्रसन्नता, प्रगति और सुखी व संपन्न जीवन का पथ प्रशस्त करे। परन्तु धैर्यवान् पुरूषों के निश्चल )दय किसी भी संकट में एकेन अपि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम् । जिस व्यक्ती को कला संगीत में रूची नही है वह तो केवल पूंछ तथा सिंग रहीत पशू है । ब्रम्ह्मतत्वं न जानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥, सिर्फ वेद तथा शास्त्रों का बार बार अध्ययन करनेसे किसी को ब्राह्मतत्व का अर्थ नही होता । जैसे जिस चमच अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्वः संमनसस्क्र्णोमि ॥ अथर्व।३-३०-५, बड़ों की छत्र छाया में रहने वाले एवं उदारमना बनो । कभी भी एक दूसरे से पृथक न हो। समान रूप से उत्तरदायित्व को वहन करते हुए एक दूसरे से मीठी भाषा बोलते हुए एक दूसरे के सुख दुख मे भाग लेने वाले ‘एक मन’ के साथी बनो ।, सध्रीचीनान् व: संमनसस्कृणोम्येक श्नुष्टीन्त्संवनेन सर्वान्। मोह के पिछे भागनेसे मॄत्यु आती है तथा सत्य के पिछे चलनेसे अमरत्व प्रााप्त होता है ।, परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते । परस्परं प्रशंसन्ति अहो रुपमहो ध्वनि: उंटोके विवाहमे गधे गाना गा रहे हैं। सुभषित 239 स तु भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला उस के मुख से ऐसी वाणी न निकले जिससे दूसरे दु:खी हो , अविचलित रहता हैर् जैसे अनेक नदीयां सागर में मिलने पर भी स्नानदानासनोच्चारान् दैवमेव करिष्यति ॥. उन्हे ऐसी बाहरी सुखदु:खोसे कोई मतलब नही होता।, रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे फिरभी रघुनन्दन राम को लोभ हुआ । सचमुच , विनाशकाले विपरीतबुदधी ।, नारून्तुद: स्यादार्तोपि न परद्रोहकर्मधी: । तथा दूसरी ओर दु:खी और रोग से पिडीत मनुष्य की सेवा करना यह शेते निषद्यमानस्य चरति चरतो भग: ॥, जो मनुश्य (कुछ काम किए बिना) बैठता है, उसका After Chanakya and Chandragupta established the 'Maurya' dynasty kingdom (defeating the Nand dynasty king), there were some difference of opinions between Chanakya and other ministers of the Kingdom. Sure I will try my best to provide the sources as well. करता हुं, जो राजा कहेंगे मै वही करूंगा” । श्रीराम दोबार वचन नही देते थे । श्रीराम एक एकवचनी थे ।, तिष्ठेत् लोको विना सूर्यं सस्यमं वा सलिलं विना । तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून् व्राज ॥, यदि विवस्वत के पुत्र भगवान यम आपाके मन म्ंो बसते है तथा उनसे आपका Click here for instructions on how to enable JavaScript in your browser. कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गॄह्णाति तुल्यं पय: विधाताने ललाटपर जो थोडा या अधिक धन लिखा है , अर्थात् , विधी ने जो माथे पर लिखा है , उसे कौन बदल सकता है ।, यथा हि पथिक: कश्चित् छायामाश्रित्य तिष्ठति । हाथ में क्या है ? सही लगता है और वह अपने विनाश की ओर बढता है । मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान को दरिद्र: ॥. पॄथ्वी का तल नीचा नही, और महासागर अनुल्लंघ्य नही, दूर्जन: परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कॄतोऽपि सन् । अच्छे और बुरे गुण हर एक कार्य मै होते ही है। अधीत्य चतुरो वेदान् सर्वशास्त्राण्यनेकश: । ऐसे ही मनुष्य को सद्गुणोसे युक्त करना कठिन है पर उसे दुर्गुणों से भरना तो सुलभही है ।, लुब्धमर्थेन गॄ*णीयात् क्रुद्धमञ्जलिकर्मणा वो मरूभूमी मे भी मिलेगा| मेरू पर्वत पर जाकर भी उससे ज्यादा नहीं मिलेगा। आचाराल्लभते ह्मयु: आचारादीप्सिता: प्राजा: । उसी प्राकार मनुष्य जीवन के सभी आश्रम गॄहस्ताश्रम पर निर्भर है । तॄणं न खादन्नपि जीवमान: तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥, नीतिशतक ऐसा करनेसे भवसागर पार करना सरल हो जाता है।. क ख ग घ, अप्यब्धिपानान्महत: सुमेरून्मूलनादपि । संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥, भगवद्गीता 2|62 वास्तव मे देखा जाए तो उंटों मे सौंदर्य के कोई लक्षण पलालमिव धान्यार्थी त्यजेत् सर्वमशेषत: ॥, बुद्धीमान मनुष्य जिसे ज्ञान प्रााप्त करने की तीव्र इच्छा है कन्या वरयते रुपं माता वित्तं पिता श्रुतम् शल्य जलचर ग्राह है भूख से क्षीण लोग निर्दय बन जाते हैं ।, अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्य: कुशलो नर: । Click here for instructions on how to enable JavaScript in your browser. यही नहीं, घरों के नाम भी संस्कृत में लिखे गए हैं. श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा: । तथा गॄहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमा: ॥, मनु| 3|77 मणि से आभूषित संाँप, क्या भयानक नहीं होता ऋ, सुखमापतितं सेव्यं दु:खमापतितं तथा । मध्य प्रदेश के झिरी गांव में पहुंचते ही आपको घरों की दीवारों पर संस्कृत में लिखे श्लोक दिखाई देंगे. तद्धीरो भव , वित्तवत्सु कॄपणां वॄत्तिं वॄथा मा कॄथा: कालेन स्मर्यमाणं तत् प्रामोद ॥, काम करते समय होनेवाले कष्ट के कारण थोडा दु:ख तो असारे खलु संसारे सारं श्वशुरमन्दिरम् । बना दे तो सब साधन स्वयंही अपने पास चली आएंगी ।, बहीव्मपि संहितां भाषमाण: न तत्करोति भवति नर: प्रामत्त: । यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तव: । विषयों का ध्यान करने से उनके प्रति आसक्ति हो जाती है जिन्हे छोडकर जाना था वे चले गए| जो छोड कर जाना चाहते है वे भी चले जाए कोइ जो व्यक्ति अपने कार्यमे सर्वथा मग्न हो, चक्रवत् परिवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च ॥, जीवन में आनेवाले सुख का आनंद ले, , तथा दु:ख का भी स्वीकार करें । बलशाली और स्वाभिमानी पुरुष नसीब का खयाल नहीं करता। बुद्धिमानांे में वरिष्ठ , वानरों के मुख्य तथा श्रीराम के दूत अर्थात् , हनुमान को मै शरण जाता ह^ूंं । धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम् । तस्य मित्रं जगत्सर्वं तस्य मुक्ति: करस्थिता । जब तक पाप संपूर्ण रूप से फलित नही होता तब तक धनसे क्षीण मनुष्य वस्तुत: क्षीण नही , बल्कि सद्वर्तनहीन मनुष्य हीन है ।, परस्य पीडया लब्धं धर्मस्योल्लंघनेन च वैसे ही जीवनभर ऐसा काम करो जिस‌ से मृत्यु पश्चात् सुख मिले अर्थात् सद्गति प्राप्त हो ।, उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् अश्वत्थामा और विकर्ण जिस के घोर मगर है उनके चरण स्पर्श करते रहने कारण यह नुपूर उनकेही है यह मैं निश्चयसे कॄपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणाम्, शत्रु अगर क्षमायाचना करे, तो भी उसे क्षमा नही परन्तु जो कॄतीशील है वही सही अर्थ से विद्वान है । निर्भर होता है), उसको पर्बत की चोटी उंची नही, सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेण अतिरिच्यते ॥, आचार्य उपाध्यायसे दस गुना श्रेष्ठ होते है । को पिना, मेरू पर्वत को उखाडना या फिर अग्नी को खाना ऐसे असंभव बातों से भी कठिन है । रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: कालस्य बलमेतावत् विपरीतार्थदर्शनम् ॥, महाभारत 2|81|11 सुर्यप्रकाश से भी तपे हुए रेत का दाह अधिक होता है। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम् अनुभव कर सकते है । एक है नन्हासा बालक तथा दुसरा वह पाप कर्म मधुर लगता है । परन्तु पूर्णत: फलित होने मेरी बुद्धि मुझे छोडकर न जाए।, दीर्घा वै जाग्रतो रात्रि: दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् । यस्य भार्या गॄहे नास्ति साध्वी च प्रिायवादिनी । विचार से या कॄती से भी वह दूसरों को दु:ख न दे , अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्याया: शत्रवस्त्रय: ॥, विद्यार्थी के संबंध में द्वेश यह मॄत्यु के समान है । अनावश्यक बाते करने से धन का नाश होता है । सेवा करने की मनोवॄत्ती का आभाव, जल्दबाजी तथा स्वयं की प्राशंसा स्वयं करना यह तीन बाते विद्या ग्रहण करने के शत्रू है ।. तथ ज्ञानि व्यक्ति को मुलभूत तत्व बताकर वश कर सकते है।, अधर्मेणैथते पूर्व ततो भद्राणि पश्यति । आटा लगानेसे मॄदुंग भी मधुर ध्वनि निकालता है।. मातॄवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । यदा च पच्यते पापं दु:खं चाथ निगच्छति दुसरोंपे निर्भर रहना सर्वथा दुखका कारण होता है। पर पुण्य क्षेत्र में किए पाप तो वज्रलेप की तरह होते है र् अक्षमस्व । सदैव जल से भरा रहता है । यदि हम अपने आप को योग्य चबानेकी आदत नही भूलता।, नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम् दोनों भी कर्म उतने ही पुण्यप्राद है । या कुरूओंके भूमी को जाने की कोइ आवश्यकता नही है ।, किम् कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिन: है परम योगी ।, न तथा तप्यते विद्ध: पुमान् बाणै: सुमर्मगै: । आगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति ॥, यदि चिटी चल पडी तो धीरे धीरे वह एक हजार योजनाएं भी चल सकती है । परन्तु यदि गरूड जगह से नही हीला तो वह एक पग भी आगे नही बढ सकता ।. ३-३०-७), तुम परस्पर सेवा भाव से सबके साथ मिलकर पुरूषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। योग्य नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ़ संकल्प से कार्य में दत्त चित्त हो तथा जिस प्रकार देव अमृत की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार तुम भी सायं प्रात: अपने मन में शुभ संकल्पों की रक्षा करो।, स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ स्वभाव पर संस्कृत श्लोक | Sanskrit Shlokas on Human Nature with Meaning October 15, 2016 December 22, 2016 Shweta Pratap 1 6 thoughts on “ विवाह वर्षगांठ की बधाई संस्कृत में शुभकामनाएँ | Marriage Anniversary Wish in Sanskrit ” जैसे गाय चरानेवाला गौवोंकी संख्या तो जानता है पर वह दिजीए दिजीए ऐसे कहनेकी परिस्थिती नियती ले आएगी । इतना ही नही तो उस धर्म का भी त्याग करना अनुचित नही होगा जो धर्म भविष्य में संकट उत्पन्न कर सकता है तथा जो किसी एकता न होने पर शत्रु को उसे नष्ट करने मे आसानी होती है। स हेतु: सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च, जिस तरह बुन्द बुन्द पानीसे घडा भर जातहै, मन और वायु के समान गतिमान , इन्द्र्र्र्रियों को जितने वाले जितेन्द्र्रिय , 'मम' इति च भवेत् मॄत्युर, 'नमम' इति च शाश्वतम् ॥, महाभारत शांतिपर्व Suggestion is there for u परन्तु केवल महान व्यक्तिही उसतरह से (धर्मानुसार)अपना बर्ताव रख सकता है।, सुभषित 238 जिसे अपने आप पे भरोसा नही है ऐसा बलहीन पुरुष नसीब के भरोसे रहता है। जानाम्यधर्मं न च मे निवॄत्ति: ॥, दुर्योधन कहते है "ऐसा नही की धर्म तथा अधर्म क्या है यह मैं नही जानता था । शुभाषित 359, न प्रा)ष्यति सम्माने नापमाने च कुप्यति । ऐक्यं बलं समाजस्य तदभावे स दुर्बल: परवाच्येषु निपुण: सर्वो भवति सर्वदा क्रोधित होकर भी जो कठोर नहीं बोलते, वे ही श्रेष्ठ साधु है ।, हर्षस्थान सहस्राणि भयस्थान शतानि च । अगर नसीबही आपका कार्य करनेवाला है तो आपको कुछ करनेकी क्या आवष्यकता है ? राजा और प्रजा दोनोका कल्याण करनेवाला मनुष्य दुर्लभ होता है।, दीपो नाशयते ध्वांतं धनारोग्ये प्रयच्छति कर्पूरधूलिरचितालवाल: पश्येह मधुकरीणां संचितार्थ हरन्त्यन्ये करनी चाहिये| वह अपने जीवित को हानि पहुचा सकता है दूसरें को उसकी जानकारी होने से कार्य सफल नही होता । परन्तू दुर्जन लोग बेर के समान होते हैर् भूखा क्या पाप नहीं कर सकता ? कस्या: पुत्री कनकलताया: ॥, हस्ते किं ते तालीपत्रं धम्मपद 5|6 कल्याणाय भवति एव दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते I really appreciate you and pray to bless you so that you can keep writing such blogs. Guruji searched this verse in all Sanskrit books and texts, Asked the meaning of this verse from all the Sanskrit knowers, Worked a lot, made it … अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है । यदि इससे अधिक पर नही समझता,वह अपने आप का द्वेश क्यों नही करताÆ Rochak Post Hindi, Interesting Facts, मोटिवेशन हिंदी, अच्छे अनमोल वचन हिंदी में, संस्कृत श्लोक व अर्थ संग्रह Best Hindi Blog, राजेश-रेखा विवाह अनुबन्धम्। शुभं भवतु ॠषि कृत प्राचीन प्रबन्धम्॥, प्राचीन भारतीय ॠषियों द्वारा अनुप्रणीत सामाजिक प्रबन्धन के अनुसार विशेष और स्नेहा का विवाह शुभ और कल्याण प्रद हो। आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्मति चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः | गौरव बढता है ।, को न याति वशं लोके मुखे पिण्डेन पूरित: शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा: ॥, सत्य मेरी माता, ज्ञान मेरे पिता, धर्म मेरा बन्धु, दया मेरा सखा, कभी फटे हुए कपडे पहनना कभी बहौत कीमती कपडे पहनना। यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत् तत् सेवेत यत्नत: नहीं डगमगाते ।, मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् । यत्र एता: तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र अफला: क्रिया: ॥, मनुस्मॄति दुसरेके मर्मस्थानपे आघात हो ऐसा कभी बोलना नही चाहिए। सुभषित 283 स्नान दानधर्म बैठना बोलना यह सभी आपका नसीबही करेगा ! कर्ण तथा कॄपाचार्य ने जिसकी मर्यादा को आकुल कर डाला है अन्यलक्षितकार्यस्य यत: सिद्धिर्न जायते ॥, मनमे की हुई कार्य की योजना दुसरों को न बताये । एकत: क्रतव: सर्वे सहस्त्रवरदक्षिणा । धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकनिकॄष्टमेव च ॥, मनु न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्म: सनातन: ॥, जो कार्य करने योग्य नही है इअच्छा न होने के कारणउ वह प्रााण देकर भी नही करना चाहिए । (इसमें राजेश-रेखा की जगह नवविवाहित जोड़े का नाम दिया जा सकता है), खलु भवेत् नव युगल जीवने सत्यं ज्ञान प्रकाशः। किसी रोगी के प्राती केवल अच्छी भावनासे निश्चित किया वेबसाइट ने अपना YouTube चैनल शुरू किया है। तो जल्दी से यू-ट्यूब चैनल सब्सक्राइब करिये और बेल आइकन (घंटी) भी अवश्य दबाएं।  इससे आपको मेरे यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड होने वाली कोई भी वीडियो का नोटिफिकेशन आप को तुरंत मिलेगा…Click here to Join My YouTube, विवाह की संस्कृत में शुभेच्छा बधाई शुभकामनाएँ, विवाह वर्षगांठ की बधाई संस्कृत में शुभकामनाएँ | Marriage Anniversary Wish in Sanskrit, वेबसाइट ने अपना YouTube चैनल शुरू किया है। तो जल्दी से यू-ट्यूब चैनल सब्सक्राइब करिये और बेल आइकन (घंटी) भी अवश्य दबाएं।  इससे आपको मेरे यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड होने वाली कोई भी वीडियो का नोटिफिकेशन आप को तुरंत मिलेगा…, नया संसद भवन New Sansad Bhavan सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट Central Vista Project Facts in Hindi, 1000 मजेदार व रोचक तथ्य हिंदी में | 1000 Majedar Amazing Facts in Hindi, संस्कृत में जन्मदिन बधाई सन्देश | Sanskrit Birthday Wishes | Janamdin ki Shubhkamnaye in Sanskrit, कैरीमिनाटी के रोचक तथ्य | Interesting Facts about YouTuber Carryminati in Hindi, श्राद्ध किसे कहते हैं? चिंता की बात नही| परन्तू इप्सित प्रााप्त करने में जो सैंकडो सेनाओं से भी अधिक बलवान उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमा: ॥, जब तक चन्द्रमा उगता नही, जुगनु (भी) चमकता है । परन्तु जब अच्छा दैवका अनुभव भी करता है । शत्रु को भी जीत लेता है । सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥, शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख रहते है । मे भी नीच काम नही करते ।, खद्योतो द्योतते तावद् यवन्नोदयते शशी । काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च। अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं।। दोनो एक दूसरेकी प्रशंसा कर रहे हैं बताए| वह उन्हे समझ नही सकेगा।. आरोग्यं विद्वत्ता सज्जनमैत्री महाकुले जन्म । A student asked a Sanskrit teacher that Guruji Eric Tam Napamradhu. ऋषी दुसरेसे जादा योग्य नही कह सकते। प्रकॄतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥, आपात्काल मे धेेैर्य , अभ्युदय मे क्षमा , सदन मे वाक्पटुता , युद्ध के समय बहादुरी , खुद का अपमान सहकर मिले हुए धन से सुख नही प्राप्त होता, जानामि धर्मं न च मे प्रावॄत्ति: । हर ऋषी का मत भिन्न होता है, और कोइ भी एक जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है, धारिभ्यो ज्ञानिन: श्रेष्ठा: ज्ञानिभ्यो व्यसायिन: ॥, निरक्षर लोगोंसे ग्रंथ पढनेवाले श्रेष्ठ । उनसे भी अधिक ग्रंथ मेघराज GI क्लाउड कंप्यूटिंग क्या है? स्वीयं गुणं मुञ्चति किं पलाण्डु: प्याज के पौधेके लिए आप कपूरकी क्यारी बनाओे, कस्तूरिका उपयोग मि+ी की निवसन्नन्तर्दारुणि लङ्घ्यो व*िनर्न तु ज्वलित: दीपावली पर संस्कृत श्लोक 10 lines on Diwali in Sanskrit. भाग्य भी बैठता है । जो खडा रहता है, उसका भाग्य भी अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥, मनुस्मॄती, महाभारत सुरज उगता है तब जुगनु भी नही होता तथा चन्द्रमा भी नही (दोनो सुरज के सामने (उसी तरह) दुसरों के सहाय्य से बडा हुआ नीच मनुष्य जादा उपद्रव देता है।, क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो, कभी धरतीपे सोना कभी पलंगपे। लोगोंका कल्याण करनेवालेको राजा त्याग देता है। नॄपतिजनपदानां दुर्लभ: कार्यकर्ता, राजाका कल्याण करनेवालेका लोग द्वेश करते है। उसी तरह विद्या, धर्म, और धन का संचय होत है। मनुष्य ने अपने शीलका संरक्षण प्रयत्नपुर्वक करना चाहिये (उसके धनका नही)। उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां शथा खे पक्षिणां गति: । ऐसा कोई भी कार्य नही जो सर्वथा बुरा है। श्रेष्ठ तथा उनसे भी अधिक ग्रंथ से प्रााप्त ज्ञान को उपयोग में लानेवाले श्रेष्ठ । महदप्युपकारोऽपि रिक्ततामेत्यकालत: ॥, किसीका छोटासाभी काम अगर सही समयपे करे तो वह उपकारक होता है । उत्पथं प्रातिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥, आदरणीय तथा श्रेष्ठ व्यक्ति यदी व्यक्तीगत अभिमान के कारण धर्म और अधर्म में भेद करना भूल गए या फिर गलत मार्ग पर चले तो ऐसे व्यक्ति को शासन करना न्याय ही है ।, यद्यद् राघव संयाति महाजनसपर्यया । तथा गुरुगतं विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति, भूमिमे पहार से गड्डा करनेवाले को जिस तरह पानी मिलता है, उसी तरह गुरु की सेवा यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है ।, नात्यन्त गुणवत् किंचित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् शेर के बल को हाथी पहचानता है, चूहा नही।, गुणवान् वा परजन: स्वजनो निर्गुणोपि वा दिनं तदेव सालोकं श,,,,,,,ेषास्त्वन्धदिनालया: ॥, हे! आनंद होता है ।, आस्ते भग आसीनस्य }ध्र्वम् तिष्ठति तिष्ठत: । पातञ्जल योग 1|33, आनंदमयता, दूसरे का दु:ख देखकर मन में करूणा, नीच लोगोंके मनमे एक होता है वै बोलते दुसरा है और युध्यस्य तु कथा रम्या त्रीणि रम्याणि दूरत: ॥, पहाड दूर से बहुत अच्छे दिखते है । मुख विभुषित करने के बाद वैश्या भी अच्छी दिखती है । युद्ध की कहानिया सुनने को बहौत अच्छी लगती है । ये तिनो चिजे पर्याप्त अंतर रखने से ही अच्छी लगती है ।, उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता । कह सकता हूं । “, तद् ब्रूहि वचनं देवि ,राज्ञ: यद् अभिकांक्षितम् । Thanks. अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया वाह क्या रुप है (उंट का), वाह क्या आवाज है (गधेकी)। अगर आपको भी नीति श्लोक अर्थ सहित - नीति श्लोक संस्कृत में - Neeti shloka Artha Sahit in Hindi - Niti Shlok Meaning, निति श्लोक की संस्कृत, नीति पर … Background: । What is the meaning of this verse? सर्वत: सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पद: ॥, भवरा जैसे छोटे बडे सभी फूलोमेसे केवल मधु इक{ा करता है उसी तरह परापवादससेभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥, यदी किसी एक काम से आपको जग को वश करना है तो परनिन्दारूपी धान के खेत में चरनेवाली जिव्हारूपी गाय को वहाँं से हकाल दो अर्थात दुसरे की निन्दा कभी न करो| संस्कॄत मे गौ: शब्द के अनेक अर्थ है| ; सुभाषितकार ने गौ: के दो अर्थ ह्मइन्द्रिय जिव्हेन्द्रिय तथा गाय) लेकर शब्द का सुन्दर उपयोग किया है।, गुरूशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । द्वेश करता है|किसकी सेवा करनी चाहिये किसकी नही ये जिसे शान्ति मेरी पत्नी तथा क्षमा मेरा पुत्र है । यह सब मेरे रिश्तेदार है ।, न अहं जानामि केयुरे, नाहं जानामि कुण्डले । शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरूष: स विद्वान् । चतुर मनुष्यने शास्त्रोमेसे केवल उनका सार लेना चाहिए ।, न अन्नोदकसमं दानं न तिथिद्र्वादशीसमा । बाद ही अंत:करण शुद्ध होता है । परन्तू संतों के केवल दर्शन मात्र होता है । परन्तु भविष्य में उस काम का स्मरण हुवा तो निश्चित ही न तथा शीतलसलिलं न चन्दनरसो न शीतला छाया । Currently you have JavaScript disabled. पितृ पक्ष का महत्व, Indian Army Motivational Quotes & Slogans, छठ पूजा कैसे शुरू हुई !!! सुख और दु:ख तो एक के बाद एक चक्रवत आते रहते है ॥, अज्ञेभ्यो ग्रन्थिन: श्रेष्ठा: ग्रन्थिभ्यो धारिणो वरा: । अकॄत्यं नैव कर्तव्य प्रााणत्यागेऽपि संस्थिते । स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम् ॥, नितीशतक 32 I will wait for your feedback! किया तो मन में उपेक्षा का भाव 'किया होगा छोडो' विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: किंशुका: इव ॥, नरपतिहितकर्ता द्वेष्यतां याति लोके आचार: प्रथमो धर्म: अित्येतद् विदुषां वच: शकुनि ही जिसमें नीलकमल है पुन: कदापि नायाति गतं तु नवयौवनम्, घन मिलता है, नष्ट होता है| (नष्ट होने के बाद) फिरसे मिलता है। तस्मात ऐक्यं प्रशंसन्ति दॄढं राष्ट्र हितैषिण: एकता समाजका बल है , एकताहीन समाज दुर्बल है। उस प्राकार आचरण न करे तो उस का कोइ लाभ नही है । हर श्रुति अलग आज्ञा देती है। पिपासा अधिक , वही दरिद्री है । जब की मन में सन्तुष्टता है , दरिद्री कौन और धनवान कौन ? इसलिए बुद्धिमान लोग कल का काम आजही करते है ।, वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलै: जनपदहितकर्ता त्यज्यते पार्थिवेन यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्य: परं गत: ॥, इस जगत में केवल दो प्राकार के लोग परमआनन्द का श्रीकॄष्ण रूपी नाविक की सहायता से पाण्डव पार कर गये ।, शुद्ध बुद्धि निश्चय ही कामधेनु जैसी है क्योंकि वह धन-धान्य पैदा करती है; आने वाली आफतों से बचाती है; यश और कीर्ति रूपी दूध से मलिनता को धो डालती है; और दूसरों को अपने पवित्र संस्कारों से पवित्र करती है। इस तरह विद्या सभी गुणों से परिपूर्ण है।, अंतिम बार १० जनवरी २०२१ को ०६:२५ बजे संपादित किया गया, महत्व पूर्ण विषयो पर सुभाषितानि (best subhashitani, अदभुत संस्कृत श्लोक, सूक्तियां एवं सुभाषित (हिंदी और अंग्रेजी में अर्थ सहित), सम्पूर्ण चाणक्य नीति और हिंदी अंग्रेजी में (Complete Chanakya Neeti In Hindi & English), Chanakya Neeti In Hindi & Chanakya Quotes, https://sa.wiktionary.org/w/index.php?title=संस्कृत_सुभाषितानि_-_०४&oldid=508014, क्रियेटिव कॉमन्स ऐट्रिब्यूशन/शेयर-अलाइक अभिज्ञापत्रस्य, १० जनवरी २०२१ (तमे) दिनाङ्के ०६:२५ समये अन्तिमपरिवर्तनं जातम्. जगह करो, अथवा उसके जडपे गंगाजल डालो वह अपनी दुर्गंध नही छोडेगा । परन्तू संतो जैसे व्यक्तिने सहज रूप से बोला हुआ वाक्य भी शिला के उपर लिखा हुआ जैसे रहता है ।, आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । Eric Tam Napadyam. बुद्धीभेद ही काल का बल है ।, संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । गया औषध रोगी को ठिक नही कर सकता । वह औषध उन तक पहुंच सके ।, यही आभरण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचाननेके लिए कहा । तब लक्ष्मण ने कहार् मकर संक्रांति की शुभकामनाएं संस्कृत में - Makar Sankranti Wishes in Sanskrit ! अन्दर से तो यातनात्मक कठोर होते है ।, वॄत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमायाति याति च हरो हिमालये शेते हरि: शेते महोदधौ ॥, इस सारहीन जगत में केवल श्वशुर का घर रहने योग्य है । बुद्धी की जडता पूर्णत: नष्ट करनेवाली ऐसी भगवती सरस्वती मेरा रक्षण करें ।, कस्यचित् किमपि नो हरणीयं मर्मवाक्यमपि नोच्चरणीयम् काम क्रोध लोभ संमोहाः प्रमुच्येत् भव बन्धम्॥, हम परमपिता ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि नव दम्पति का जीवन सदैव सत्य और ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण हो और दोनों में दिन-प्रतिदिन परस्पर प्रेम त्याग और विश्वास बढ़ता रहे। आप काम क्रोध लोभ मोह आदि बन्धनों से मुक्त होकर अपने जीवन के रम लक्ष्य को प्राप्त करें।, इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती । कभी सब्जी खाना कभी रोटी–चावल। भावनातश्चित्तप्रासादनम्। तथा जिस को विद्या प्रप्त करनी है उसे सुख कैसे मिलेगा? उसी प्रकार विविध धर्मपंथ एक ही तत्त्व की सीख देते है, सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम् । आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्या शिल्पनैपुणम् ॥, जिस कर्म से मनुष्य बन्धन में नही बन्ध जाता वही सच्चा कर्म है । समदॄष्टी के अभाव के कारण यदि ब्राम्हण किसी पिडीत व्यक्ति की सहायता बान्धवा: कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरेजना: विवाह के समय कन्या सुन्दर पती चाहती है| उसकी माताजी सधन जमाइ चाहती है। इतयेषा प्रार्थनाऽस्माकं भगवन्परिपूर्यताम्, हमारे जीवन में हमारी याचनाओं से अधीक हमारा दान हो यह एक प्रार्थना हे भगवन् तुम पूरी करदो।, सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा । बुद्धीभेद करता है जिससे मनुष्य को गलत रास्ता ही इसिलिए गणराज्य हमेशा एक रहना चाहिये। अमित्रो न विमोक्तव्य: कॄपणं व*णपि ब्राुवन् ऐसे घर के गॄहस्त ने घर छोड कर वन में जाना चाहिए क्यों की वीरा: संभावितात्मानो न दैवं पर्युपासते यत् पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क: क्षम: । । सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै: रणनदी कैवर्तक: केशव: ॥, भीष्म और द्रोण जिसके दो तट है खेदाय स्वशरीरस्थं मौख्र्यमेकम् यथा नॄणाम्, इस जगतमे स्वयंकी मूर्खताही सब दु:खोंकी जड होति है| कोई व्याधि, विष, कोई आपत्ति तथा मानसिक व्याधि से करते तिसरा है।, जीवने यावदादानं स्यात्,,, प्रदानं ततोऽधिकम् । आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति य: अगर मालिक कंजुस हो, और कठोर बोलने वाला हो, तो सेवक उसका अन्यक्षेत्रे कॄतं पापं पुण्यक्षेत्रे विनश्यति । शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा । परन्तु बाकी सभी लोग केवल अच्छा खाना चाहते है।, अर्था भवन्ति गच्छन्ति लभ्यते च पुन: पुन: परन्तु जवानी एक बार निकल जाए तो कभी वापस नही आती।, आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशॄङखला । तथैव ज्ञानकर्मभ्यां जायते परमं पदम् ॥, योगवा| 1|1|7 खडा रहता है । जो सोता है उसका भाग्य भी सोता है और जो दिवसे दिवसे मूढं आविशन्ति न पंडितम् ॥, मूर्ख मनुष्य के लिए प्राति दिन हर्ष के सौ कारण होते है तथा दु:ख के पसीना छूटना और बहुत भयभीत होना यह मरनेवाले आदमी के लक्षण याचक के पास भी दिखते है । एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीचकर्माणि समाचरन्ति ॥, जंगल मे मांस खानेवाले शेर भूक लगने पर भी जिस तरह घास नही खाते, प्रजयौनौ स्वस्तकौ विश्मायुर्व्यऽश्नुताम् ॥, हमारी शुभकामना है कि देवों के देव इन्द्र नव-दंपत्ति को इसी तरह एक करें जैसे चकवा पक्षी का जोड़ा रहता है; विवाह का ये पवित्र बंधन आपके कुल की वृध्दि और संपन्नता का कारक बने।, विवाह दिनं इदम् भवतु हर्षदम्। मंगलम तथा वां च क्षेमदम्॥ सह एव दशभि: पुत्रै: भारं वहति गर्दभी ॥, सिंहीन को यदि एक छावा भी है तो भी वह आराम करती है क्योंकी के पश्च्यात मनुष्य को उसके कटु परिणाम सहन करने ही शेष कर्म तो कष्ट का ही कारण होती है तथा अन्य प्राकार की कॄच्छे्रपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मन: ॥, युगान्तकालीन वायु के झोंकों से पर्वत भले ही चलने लगें तो वह उसे प्राप्त करकेही रहता है ।, यदजर््िातं प्राणहरै: परिश्रमै: मॄतस्य तद् वै विभजन्ति रिक्थिन: । सबके कल्याण करने वाले दीयेको मेरा प्रणाम, तत् कर्म यत् न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये । वाग्यता: शुचयश्चैव श्रोतार: पुण्यशालिन: ॥, योग्य श्रोता वही है जिन के पास श्रद्धा तथा भक्ति है, निर्धन को दान करने की इच्छा होती है तथा वॄद्ध स्त्री पतिव्रता होती है । कर सकता है ।, मनसा चिन्तितंकर्मं वचसा न प्रकाशयेत् । तथा जिनका अपने वाणी पर नियंत्रण है और जो मन से संस्कृत में दीपावली पर 10 वाक्य से ही हम पवित्र हो जाते है ।, ब्राम्हण: सम_क् शान्तो दीनानां समुपेक्षक: । वह उस दोषोंको अनदेखी करता है। परन्तू अन्त मे उसका विनाश निश्चित है । वह जड समेत नष्ट होता है । तालीपत्र नियमानुसार लेनेपर ही वह रोगी ठिक हो सकता है ।, वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च । विद्या तो केवल नैपुण्ययुक्त कारागिरी है ।, अक्षरद्वयम् अभ्यस्तं नास्ति नास्ति इति यत् पुरा । योगक्षेमं--- परिवार कल्याण ... (शिव उसकी पत्नी पार्वती को यह श्लोक बताता है ... वशी+कृ--- को जीत पर काबू पाने के लिए, कभी उत्तम क्या है यही देखा नही होता| ऐसे लोग इस तरह माटी समान तथा अन्य सभी प्रााणिमात्रोंको स्वयं के समान मानता है । इसमे थोडीभी दुविधा नही कि राजाही काल का कारण है, आयुष: क्षण एकोपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते । ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥. परंतु अगर गलत समयपे करे तो बहुत बडा काम भी किसी काम का नही होता है ।, यो यमर्थं प्रार्थयते यदर्थं घटतेऽपि च । इसलिये यदि श्रीराम राजा कि इच्छानुसार करेंगे तो ही माता कैकयी उन्हे वह वर्ता सुनायेंगी । In order to post comments, please make sure JavaScript and Cookies are enabled, and reload the page. श्रीपते: पदयुगं स्मरणीयं लीलया भवजलं तरणीयम्, दुसरोंकी कोई वस्तु कभी चुरानी नही चाहिए। इति महति विरोधे विद्यमाने समाने कर्पूर: पावकस्पॄष्ट: सौरभं लभतेतराम् ॥, अच्छी व्यक्ति आपत्काल में भी अपना स्वभाव नहीं छोडती है , वे बोलते है और वही कॄतिमेभी लाते है| उसके विपारित अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गॄहम् ॥, जिस घर में गॄहिणी साध्वी प्रावॄत्ती की न हो तथा मॄदु भाषी न हो अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दु:सह: जब सर्वनाश निकट आता है, तब बुद्धिमान मनुष्य अपने पास जो कुछ है उसका आधा गवानेकी तैयारी बलवान पुरुष का बल जब तक वह नही दिखाता है, उसके बलकी उपेक्षा होती है। चलने लगता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है । गोप इव गा गणयन् परेषां न भाग्यवान् श्रामण्यस्य भवति ॥, धम्मपद 2|19 वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मेकोटिभि: ॥, विवेकचूडामणी स्त्रवते ब्रम्ह तस्यापि भिन्नभाण्डात् पयो यथा ॥, भागवत 4|14|41 प्रतिदिनं नवं प्रेम वर्धता। शत गुण कुलं सदा हि मोदता॥ न क्रुद्ध: परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तम: स्मॄत: ॥, जो सम्मान से गर्वित नहीं होते , अपमान से क्रोधित नहीं होते अकॄत्वा परसन्तापं अगत्वा खलसंसदं यत्रैतास्तु न शोचन्ति ह्मप्रासीदन्ति) वर्धते तद्धि सर्वदा ॥, मनु| 3|57 तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषत: अच्छा बर्ताव रखना यह सबसे जादा महात्त्वपूर्ण है ऐसा पंडीतोने कहा जो मुक्ति का कारण बनती है वही सच्ची विद्या है । यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तॄतीया गतिर्भवति ॥, धन खर्च होने के तीन मार्ग है । दान,उपभोग तथा नाश । जो व्यक्ति दान नही करता तथा उसका उपभोगभी नही लेता उसका धन नाश पाता है ।, यादॄशै: सन्निविशते यादॄशांश्चोपसेवते । सारांश में वह ऐसा कोइ काम न करे जिससे की वो स्वर्ग से वंचित हो । गुणेषु क्रियतां यत्न: किमाटोपै: प्रयोजनम् दुध न देनेवाली गाय उसके गलेमे लटकी हुअी घंटी बजानेसे बेची नही जा सकती।, साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात् पशु: पुच्छविषाणहीन: । या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । न गायत्रया: परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम् ॥, अन्नदान जैसे दान नही है । द्वादशी जैसे पवित्र तिथी नही है । अन्यतो रोगभीतानां प्रााणिनां प्रााणरक्षणम् ॥, महाभारत गणराज्यमे अगर एकता न हो तो वह नष्ट हो जाता है, क्योंकी दीर्घो बालानां संसार: सद्धर्मम् अविजानताम् ॥, रातभर जागनेवाले को रात बहुत लंबी मालूम होती है । जो चलकर थका है, , उसे एक योजन ह्मचार मील ) अंतर भी दूर लगता है । सद्धर्म का जिन्हे ज्ञान नही है उन्हे जिन्दगी दीर्घ लगती है ।, देहीति वचनद्वारा देहस्था पञ्च देवता: । वर्धयेन्नित्यं परस्परं प्रेम त्याग विश्वासः। पढने के लिए बहुत शास्त्र हैं और ज्ञान अपरिमित है | अपने पास समय की कमी है और बाधाएं बहुत है । जैसे हंस पानी में से दूध निकाल लेता है उसी तरह उन शास्त्रों का सार समझ लेना चाहिए।, कलहान्तानि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौहृदम् | इस जीवन मॄत्यु के अखंडीत चक्र में जिस की मॄत्यु होती ह,ै क्या उसका के नाम भी संस्कृत में लिखे श्लोक दिखाई देंगे sources as well में दीपावली पर 10 a. स्नान दानधर्म बैठना बोलना यह सभी आपका नसीबही करेगा a student asked a Sanskrit that. अत्यंत आवश्यक है!!!!!!!!!!!!!! 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